"उम्मीद बँधानी है,
खुद की ही खुद से,
तक़दीर बनानी है।"
"दरिया है गहरा,
तैर के जाना है,
तोड़ के हर पहरा।"
सादर,
अशोक "मुसाफ़िर"
सिर्फ़ कागज़ पे लिखे शेर
मेरे,
खुद से कहने की बात आएगी।
इन परिन्दों को गगन दो तो सही,
तब तो उड़ने की बात आयेगी।
तन पे मरहम सा चैन देने के लिए,
धूप यादों की याद आएगी।
जब न कहने को कुछ नहीं होगा,
किसको सुनने की बात आएगी।
चँद शिकवे हैं "मुसाफ़िर" तो क्या,
जाँ उसूलों के साथ जायेगी।
मेरी एक ग़ज़ल से....
अशोक "मुसाफ़िर"
भूख/मंहगाई के आंसू पी रहे हम,
वो कह रहा,उसका सदा ही साथ है।
ख़न्ज़र लिए वो क्या बचाएगा तुझे,
बढ़ रहा तेरी तरफ़ जो हाथ है।
मज़हबी झगडे ज़मीं पर क्यों करे तूँ,
ख़ूँन कब कहता,मेरी क्या ज़ात है।
सच ज़ुबाँ बोले तो उसको बोलने दो,
ये नहीं कहना,नहीं औक़ात है।
नाम काफी है,"मुसाफ़िर"काम भी कर,
गर मानता तूँ,ज़िन्दगी सौग़ात है।
मेरी एक ग़ज़ल से......
अशोक "मुसाफ़िर"
खुद की ही खुद से,
तक़दीर बनानी है।"
"दरिया है गहरा,
तैर के जाना है,
तोड़ के हर पहरा।"
सादर,
अशोक "मुसाफ़िर"
सिर्फ़ कागज़ पे लिखे शेर
मेरे,
खुद से कहने की बात आएगी।
इन परिन्दों को गगन दो तो सही,
तब तो उड़ने की बात आयेगी।
तन पे मरहम सा चैन देने के लिए,
धूप यादों की याद आएगी।
जब न कहने को कुछ नहीं होगा,
किसको सुनने की बात आएगी।
चँद शिकवे हैं "मुसाफ़िर" तो क्या,
जाँ उसूलों के साथ जायेगी।
मेरी एक ग़ज़ल से....
अशोक "मुसाफ़िर"
भूख/मंहगाई के आंसू पी रहे हम,
वो कह रहा,उसका सदा ही साथ है।
ख़न्ज़र लिए वो क्या बचाएगा तुझे,
बढ़ रहा तेरी तरफ़ जो हाथ है।
मज़हबी झगडे ज़मीं पर क्यों करे तूँ,
ख़ूँन कब कहता,मेरी क्या ज़ात है।
सच ज़ुबाँ बोले तो उसको बोलने दो,
ये नहीं कहना,नहीं औक़ात है।
नाम काफी है,"मुसाफ़िर"काम भी कर,
गर मानता तूँ,ज़िन्दगी सौग़ात है।
मेरी एक ग़ज़ल से......
अशोक "मुसाफ़िर"
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